गम तो इस बात का है की वो मज़बूरी बयां नहीं करती है ,
सह जाती है सब कुछ पर उफ़ भी नहीं करती है ,
गुस्सा भी करती है मुझ पर ,परेशां भी होती है ,
कोने मै जा कर सुबक-२ के रोटी भी है ,
ना जाने वो दिन कब आएगा जब वो इकरार करेगी ,
चुप के से ही सही पर प्यार का इजहार करेगी ,

ना जाने ये सिलसिला कब खत्म होगा ,
गम की श्याम के बाद ,ख़ुशी का उजाला कब होगा ,
ना जाने वो पल कब आएगा ,
बस जी रहा हूँ इस उम्मीद पर की वो पल आएगा ,आएगा
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Abhishek bhatnagar

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